अध्याय 5: उपभोक्ता अधिकार
उपभोक्ता का परिचय
बाजार में जब कोई व्यक्ति अपनी आवश्यकता के लिए कोई वस्तु या सेवा खरीदता है, तो वह उपभोक्ता कहलाता है. बाजार में उपभोक्ता और उत्पादक दोनों की भागीदारी होती है. उत्पादक वस्तुओं और सेवाओं का निर्माण करते हैं, जबकि उपभोक्ता उनका उपभोग करते हैं.
उपभोक्ता आंदोलन
भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत विक्रेताओं के अनुचित व्यावसायिक व्यवहारों के प्रति असंतोष के कारण हुई. 1960 के दशक में अत्यधिक खाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाजारी और खाद्य पदार्थों में मिलावट जैसी समस्याओं ने उपभोक्ता आंदोलन को एक संगठित रूप दिया. 1970 के दशक तक, उपभोक्ता संगठन बड़े पैमाने पर लेख और प्रदर्शनियों का आयोजन करने लगे थे. इन सभी प्रयासों के परिणामस्वरूप, सरकार पर उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए कानून बनाने का दबाव बढ़ा.
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 (कोपरा)
उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया, जिसे कोपरा (COPRA) के नाम से भी जाना जाता है. यह कानून उपभोक्ताओं को विक्रेताओं के अनुचित व्यवहार के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है. 24 दिसंबर को भारत में राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि इसी दिन इस अधिनियम को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली थी.
कोपरा की मुख्य विशेषताएं:
यह अधिनियम वस्तुओं और सेवाओं दोनों पर लागू होता है.
यह उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के उल्लंघन के मामले में एक प्रभावी निवारण तंत्र प्रदान करता है.
इसने उपभोक्ता विवादों के निपटारे के लिए त्रि-स्तरीय न्यायिक तंत्र की स्थापना की है.
उपभोक्ताओं के अधिकार
कोपरा अधिनियम के तहत उपभोक्ताओं को कई अधिकार दिए गए हैं, जिनमें से प्रमुख हैं:
सुरक्षा का अधिकार: उपभोक्ताओं को उन वस्तुओं और सेवाओं से सुरक्षा का अधिकार है जो उनके जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक हो सकती हैं. उदाहरण के लिए, प्रेशर कुकर में एक सेफ्टी वाल्व होता है, जो खराब होने पर बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकता है.
सूचना का अधिकार: उपभोक्ताओं को खरीदी जाने वाली वस्तु या सेवा की गुणवत्ता, मात्रा, शुद्धता, मानक और मूल्य के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है. यही कारण है कि उत्पादों के पैकेट पर सामग्री, मूल्य, निर्माण की तारीख, समाप्ति तिथि आदि की जानकारी देना अनिवार्य है. 2005 में, भारत सरकार ने सूचना का अधिकार (RTI) कानून लागू किया, जो नागरिकों को सरकारी विभागों के कामकाज के बारे में सभी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है.
चुनने का अधिकार: उपभोक्ताओं को विभिन्न प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं में से अपनी पसंद की वस्तु या सेवा चुनने का अधिकार है. कोई भी विक्रेता उपभोक्ता को कोई विशेष उत्पाद खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है.
सुनवाई का अधिकार: यदि किसी उपभोक्ता को किसी वस्तु या सेवा से कोई शिकायत है, तो उसे अपनी बात रखने और सुनवाई का अधिकार है.
क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार: यदि किसी उपभोक्ता को अनुचित व्यापार प्रथाओं के कारण कोई नुकसान होता है, तो उसे क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार है.
उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार: प्रत्येक उपभोक्ता को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के बारे में जानने का अधिकार है.
उपभोक्ता निवारण प्रक्रिया
कोपरा अधिनियम के तहत उपभोक्ता विवादों के निपटारे के लिए एक त्रि-स्तरीय न्यायिक प्रणाली स्थापित की गई है:
जिला स्तरीय उपभोक्ता अदालत (जिला फोरम): यह 1 करोड़ रुपये तक के दावों से संबंधित मामलों की सुनवाई करती है.
राज्य स्तरीय उपभोक्ता अदालत (राज्य आयोग): यह 1 करोड़ रुपये से 10 करोड़ रुपये के बीच के दावों से संबंधित मामलों की सुनवाई करती है.
राष्ट्रीय स्तरीय उपभोक्ता अदालत (राष्ट्रीय आयोग): यह 10 करोड़ रुपये से अधिक के दावों से संबंधित मामलों की सुनवाई करती है.
यदि कोई मामला जिला स्तर की अदालत द्वारा खारिज कर दिया जाता है, तो उपभोक्ता राज्य स्तर की अदालत में और उसके बाद राष्ट्रीय स्तर की अदालत में अपील कर सकता है.
उपभोक्ता संगठनों की भूमिका
देश में कई उपभोक्ता संगठन हैं जो उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करने और कानूनी सलाह देने में मदद करते हैं. ये संगठन उपभोक्ता अदालतों में व्यक्तिगत उपभोक्ताओं का प्रतिनिधित्व भी करते हैं और “जागो ग्राहक जागो” जैसे अभियानों के माध्यम से जागरूकता फैलाते हैं.
मानकीकरण चिह्न
उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कुछ मानकीकरण चिह्न बनाए गए हैं:
आईएसआई (ISI) मार्क: यह औद्योगिक और उपभोक्ता उत्पादों की गुणवत्ता को प्रमाणित करता है. जैसे – इलेक्ट्रिकल उपकरण, हेलमेट आदि.
एगमार्क (Agmark): यह कृषि और खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करता है. जैसे – दालें, मसाले, शहद आदि.
हॉलमार्क (Hallmark): यह सोने और चांदी के आभूषणों की शुद्धता को प्रमाणित करता है.
एक जागरूक उपभोक्ता के रूप में, खरीदारी करते समय इन चिह्नों को देखना महत्वपूर्ण है.
उपभोक्ता के कर्तव्य
अधिकारों के साथ-साथ उपभोक्ताओं के कुछ कर्तव्य भी हैं:
वस्तु या सेवा खरीदते समय उसकी रसीद अवश्य लें.
वस्तु की गुणवत्ता, मात्रा और शुद्धता की जांच करें.
मानकीकरण चिह्नों की जांच करें.
किसी भी शिकायत के मामले में अपनी आवाज उठाएं.
अपने अधिकारों के बारे में जानकारी रखें.
अति लघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)
प्रश्न 1: भारत में ‘राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस’ कब मनाया जाता है?
उत्तर: भारत में 24 दिसंबर को ‘राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस’ मनाया जाता है।
प्रश्न 2: कोपरा (COPRA) का पूरा नाम क्या है?
उत्तर: कोपरा का पूरा नाम उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 (Consumer Protection Act, 1986) है।
प्रश्न 3: वस्तुओं की गुणवत्ता को प्रमाणित करने वाले किसी एक चिह्न का नाम लिखिए।
उत्तर: आईएसआई (ISI) मार्क या एगमार्क (Agmark)।
प्रश्न 4: सूचना का अधिकार (RTI) कानून भारत सरकार द्वारा किस वर्ष लागू किया गया?
उत्तर: सूचना का अधिकार (RTI) कानून भारत सरकार द्वारा सन् 2005 में लागू किया गया।
प्रश्न 5: हॉलमार्क का प्रयोग किन वस्तुओं की गुणवत्ता के लिए किया जाता है?
उत्तर: हॉलमार्क का प्रयोग सोने और चाँदी के आभूषणों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न (3 अंक)
प्रश्न 1: बाजार में नियमों तथा विनियमों की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कुछ उदाहरणों के द्वारा समझाएँ।
उत्तर: बाजार में उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए नियमों तथा विनियमों की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि अकेला उपभोक्ता प्रायः स्वयं को कमजोर स्थिति में पाता है। उत्पादक और विक्रेता कई तरीकों से उपभोक्ताओं का शोषण कर सकते हैं, जैसे:
कम वजन तौलना: विक्रेता अक्सर ग्राहकों को उचित वजन से कम सामान तौलते हैं।
मिलावटी/दोषपूर्ण वस्तुएँ बेचना: अधिक लाभ कमाने के लिए व्यापारी खाद्य पदार्थों में मिलावट करते हैं या दोषपूर्ण वस्तुएँ बेचते हैं।
अधिक मूल्य वसूलना: कभी-कभी दुकानदार छपे हुए मूल्य (MRP) से भी अधिक कीमत वसूल लेते हैं।
इन शोषणों से उपभोक्ताओं को बचाने और बाजार को निष्पक्ष बनाने के लिए नियमों और विनियमों की आवश्यकता होती है।
प्रश्न 2: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के निर्माण की जरूरत क्यों पड़ी?
उत्तर: 1986 से पहले उपभोक्ताओं को विक्रेताओं के अनुचित व्यवहार से बचाने के लिए कोई विशेष कानूनी प्रणाली नहीं थी। बाजार में अत्यधिक खाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाजारी और खाद्य पदार्थों में मिलावट जैसी समस्याओं के कारण उपभोक्ताओं का शोषण बढ़ रहा था। उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने और उन्हें न्याय दिलाने के लिए एक संगठित कानूनी ढांचे की आवश्यकता महसूस की गई। इसी के परिणामस्वरूप, भारत सरकार ने 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (कोपरा) लागू किया।
प्रश्न 3: कुछ ऐसे कारकों की चर्चा करें, जिनसे उपभोक्ताओं का शोषण होता है?
उत्तर: उपभोक्ताओं का शोषण निम्नलिखित कारकों से होता है:
सीमित सूचना: अक्सर उपभोक्ताओं को उत्पाद की सही गुणवत्ता, मूल्य और सामग्री के बारे में पूरी जानकारी नहीं दी जाती।
असंगठित उपभोक्ता: उपभोक्ता बिखरे हुए होते हैं और संगठित रूप से अपनी आवाज नहीं उठा पाते, जिससे विक्रेता उनका फायदा उठाते हैं।
असीमित आपूर्ति और सीमित प्रतिस्पर्धा: जब बाजार में किसी वस्तु की आपूर्ति कम होती है या कुछ ही कंपनियाँ उसका उत्पादन करती हैं, तो वे मनमाने ढंग से मूल्य निर्धारित कर सकती हैं।
जागरूकता की कमी: बहुत से उपभोक्ता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होते और शोषण होने पर शिकायत नहीं करते।
प्रश्न 4: उपभोक्ता के रूप में अपने कुछ कर्तव्यों का वर्णन करें।
उत्तर: एक उपभोक्ता के रूप में हमारे कुछ प्रमुख कर्तव्य निम्नलिखित हैं:
रसीद लेना: किसी भी वस्तु या सेवा को खरीदते समय कैश मेमो या रसीद अवश्य लेनी चाहिए। यह खरीद का प्रमाण होता है।
मानकीकरण चिह्नों की जाँच: वस्तुओं पर आईएसआई, एगमार्क या हॉलमार्क जैसे गुणवत्ता चिह्नों की जाँच करनी चाहिए।
जानकारी प्राप्त करना: उत्पाद के पैकेट पर दी गई जानकारी, जैसे- मूल्य, वजन, निर्माण और समाप्ति की तिथि, आदि को ध्यान से पढ़ना चाहिए।
शिकायत करना: यदि उत्पाद या सेवा में कोई दोष है तो तुरंत विक्रेता से और फिर जरूरत पड़ने पर उपभोक्ता अदालत में शिकायत करनी चाहिए।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक)
प्रश्न 1: भारत में उपभोक्ता आंदोलन की प्रगति की समीक्षा करें।
उत्तर: भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत 1960 के दशक में व्यवस्थित रूप से हुई। इसकी प्रगति को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
शुरुआती चरण: प्रारंभ में यह आंदोलन जमाखोरी, कालाबाजारी और खाद्य पदार्थों में मिलावट जैसे मुद्दों पर केंद्रित था। 1970 के दशक तक उपभोक्ता संस्थाएँ बड़े पैमाने पर लेख और प्रदर्शनियों का आयोजन करने लगी थीं।
कानूनी ढांचा: आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण कदम 1986 में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (कोपरा) का पारित होना था। इसने उपभोक्ताओं को एक कानूनी हथियार प्रदान किया।
त्रि-स्तरीय न्यायिक तंत्र: कोपरा के तहत जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उपभोक्ता अदालतों की स्थापना की गई, जिससे उपभोक्ताओं को न्याय मिलना आसान हो गया।
उपभोक्ता संगठनों का विकास: आज देश में 2000 से अधिक उपभोक्ता संगठन हैं, जो उपभोक्ताओं को जागरूक बनाने और उनके मामलों को लड़ने में मदद करते हैं।
चुनौतियाँ: इन सफलताओं के बावजूद, उपभोक्ता निवारण प्रक्रिया अभी भी जटिल, खर्चीली और समय लेने वाली साबित हो रही है। अधिकांश खरीददारियाँ छोटी दुकानों से होती हैं, जहाँ रसीद नहीं दी जाती, जिससे प्रमाण जुटाना मुश्किल होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता का स्तर अभी भी कम है।
संक्षेप में, उपभोक्ता आंदोलन ने भारत में एक लंबा सफर तय किया है और उपभोक्ताओं को सशक्त बनाया है, लेकिन इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है।
प्रश्न 2: उपभोक्ताओं के कुछ अधिकारों को बताएँ और प्रत्येक अधिकार पर कुछ पंक्तियाँ लिखें।
उत्तर: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत उपभोक्ताओं को कई अधिकार दिए गए हैं, जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं:
सुरक्षा का अधिकार: उपभोक्ताओं को उन वस्तुओं और सेवाओं से सुरक्षा का अधिकार है जो उनके जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, प्रेशर कुकर में सेफ्टी वाल्व या बिजली के उपकरणों पर ISI मार्क उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करता है। उत्पादकों के लिए यह आवश्यक है कि वे सुरक्षा नियमों का पालन करें।
सूचना पाने का अधिकार: उपभोक्ताओं को किसी भी वस्तु या सेवा की गुणवत्ता, मात्रा, शुद्धता, मानक और मूल्य के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है। इसीलिए वस्तुओं के पैकेट पर मूल्य (MRP), सामग्री, निर्माण व समाप्ति की तिथि आदि लिखना अनिवार्य है।
चुनने का अधिकार: प्रत्येक उपभोक्ता को यह अधिकार है कि वह अपनी पसंद की वस्तु या सेवा चुने। कोई भी विक्रेता किसी उपभोक्ता को कोई विशेष ब्रांड या वस्तु खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। यदि कोई गैस डीलर गैस कनेक्शन के साथ चूल्हा खरीदने के लिए बाध्य करता है, तो यह चुनने के अधिकार का उल्लंघन है।
क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार: यदि किसी उपभोक्ता को दोषपूर्ण वस्तु या सेवा के कारण कोई क्षति होती है, तो उसे क्षति की मात्रा के आधार पर क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार है। उपभोक्ता अपनी शिकायत उपभोक्ता अदालतों में दर्ज कराकर न्याय और मुआवजा प्राप्त कर सकता है।
प्रतिनिधित्व का अधिकार: इस अधिकार के तहत उपभोक्ता को उपभोक्ता अदालतों में अपनी बात रखने का अवसर दिया गया है। यदि कोई मुकदमा जिला स्तर पर खारिज हो जाता है, तो उपभोक्ता राज्य और फिर राष्ट्रीय स्तर की अदालत में अपील कर सकता है। इसे ‘सुनवाई का अधिकार’ भी कहा जाता है।
प्रश्न 3: कोपरा के अंतर्गत उपभोक्ता विवादों के निपटारे के लिए स्थापित त्रि-स्तरीय न्यायिक तंत्र को स्पष्ट करें।
उत्तर: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 (कोपरा) के अंतर्गत उपभोक्ता विवादों के निपटारे के लिए एक त्रि-स्तरीय न्यायिक तंत्र स्थापित किया गया है:
जिला स्तर का प्राधिकरण (जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग): यह जिला स्तर पर स्थापित होता है। यह 1 करोड़ रुपये तक के दावों से संबंधित मुकदमों पर विचार करता है। यदि कोई उपभोक्ता जिला अदालत के फैसले से संतुष्ट नहीं है, तो वह राज्य आयोग में अपील कर सकता है।
राज्य स्तरीय प्राधिकरण (राज्य आयोग): यह हर राज्य में स्थापित होता है। यह 1 करोड़ से 10 करोड़ रुपये तक के दावों वाले मुकदमों को देखता है। यदि कोई उपभोक्ता राज्य आयोग के फैसले से संतुष्ट नहीं है, तो वह राष्ट्रीय आयोग में अपील कर सकता है।
राष्ट्रीय स्तर का प्राधिकरण (राष्ट्रीय आयोग): यह राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली में स्थित है। यह 10 करोड़ रुपये से अधिक की दावेदारी वाले मुकदमों को देखता है।
यह त्रि-स्तरीय प्रणाली उपभोक्ताओं को उनके आर्थिक नुकसान के आधार पर उचित मंच पर न्याय पाने का अवसर प्रदान करती है और इसने उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के लिए लड़ने हेतु एक मजबूत आधार दिया है।